लेखक - इंद्रप्रकाश सैनी
E-Mail- ips@gmail.com
मेरे पास न लिखने का तजुर्बा है, न लिखने का सलीका है और ना ही कोई नाम है लेकिन प्रकटन के लिए भावनाए जरुर है । आज मुझे मेरे मित्र ने एक आग्रह किया कि मैं कुछ लिखू , कुछ बयाँ करू । बहुत सोचने के बाद मुझे कोई और विषय नजर नहीं आया सिवाय बिटिया के बारे में । मेरी भावनाए कम शब्दों में होते हुए भी इतनी विस्तृत जरुर हैं कि वो हर एक पुरुष और महिला को दिल में समाने में सक्षम होंगी । मैं संपादक महोदय से तहे-दिल से गुजारिश करूँगा कि वो मेरे लेखन की हर एक भूल अथवा गलती को सुधारते हुवे मेरी भावनाओं को इस पटल पर रखने की रहमत अता फरमाए। कहते है खुदा की नेमत होती है बिटिया। बावजूद इसके इन्हें बचाने के लिए सरकारों द्वारा अथक प्रयास किये जा रहे है ।
समाज में न जाने क्यों इनके जनम को सहर्ष स्वीकार नहीं किया जाता है ? जबकि सच बिटिया न हो तो जीवन में उत्साह न रहे। घर - आँगन में रंगोली बनती बेटी, घर को सजाती बेटी, होली के रंग में उमंग भारती बेटी, दिवाली को रोशन करती बेटी, और ना जाने किस-किस तरह से हमारे जीवन में समरसता लाती है।
कहते है कि बेटी परायी धन होती है लेकिन हकीकत ये है ये परायी होकर भी परायी नहीं होती है। हम अपने आसपास देख सकते है की कैसे वो अपने माँ -बाप को तकलीफ में देखते ही दोड़कर चली आती है । आज यहाँ तो कल वहां का खानाबदोश जीवन जीकर भी खुश रहने का हुनर एक बेटी ही सिखा सकती है। जहा वो रहती है ऐसा लगता है मानो फूल-फूल खिलते है जहा वह होती है । यह तो दुनिया की रीत है कि उसे विदा करते है लेकिन दिल का टुकड़ा बेटी परायी कहा होती है ?
सच में कितनी कीमती होती है बेटिया जो नन्ही-नन्ही परी बनकर घर में आती है और पुरे घर को खुशियों से भर देती है । फिर भी न जाने क्यों आज उसके माँ-बाप नन्ही सी परी को एक बेटी को घर नहीं बुलाना चाहते ? शायद इसलिए क्योंकि एक दिन उनकी पाली हुई बेटी दुसरे के घर चली जाएगी, कदाचित ये चिंता भी सताती होगी कि इसकी विदाई के बाद बुढ़ापे का सहारा कौन बनेगा ? समाज को अपनी सोच बदलनी होगी क्योंकि अगर बेटी को भी बेटों के बराबर विश्वास, प्यार और अधिकार दे तो बेटी भी बेटों से कम नहीं होती है । अगर फिर भी हम नहीं जागे तो वह दिन दूर नहीं जब बगिया के झूले एक बिटिया के लिए तरसेंगे, आँगन भी बिना बिटिया की हंसी के नहीं खिलेंगे, और न ही कोई सुकून बरसेगा।
सरकार को चाहिए के लिए वो बेटियों को अगर वास्तव में बचाना चाहती है , अगर लिंगानुपात को संतुलित करना चाहती है, अगर चाहती है कि समाज में समरसता बनी रहे और अपनी संस्कृति कायम रहे तो उसे चाहिए कि बेटियों को बचाने के लिए समाज में जागृति लाये, शिक्षा का उजाला फैलाये क्योंकि बेटी के जन्म पर उस परिवार को 7100/- रूपये का लालच दे क्योंकि जो घृणा समाज में बेटियों के लिए है, जो भ्रान्ति बेटियों के लिए है उसके सामने ये राशि कुछ भी नहीं है। और समाज को भी सोचना चाहिए कि अपने मन के दरवाजे बेटियों के लिए खुले रखे क्योंकि ना जाने कब एक नन्ही परी होले -होले कदमों से चल कर आये और एक मीठी सी दस्तक कहे कि पापा- ममी मैं आ गयी । रिश्ते है सभी स्वार्थ के यहाँ और कुछ भी नहीं, पर उम्रभर रिश्तों को निभाती है बेटियां .......
लेखक - इंद्रप्रकाश सैनी
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